पड़ोस वाले भैया से प्यार

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प्रेम नगर के 3 विंग के मोहल्ले में रहते थे। उम्र कोई 12 – 13 साल की, पांच सहेलियों के ग्रुप था। पांचों एक ही क्लास में पढ़ती। तब प्यार क्या होता है किसी को भी मालूम नहीं था। मोहल्ले के सभी बड़े लड़के भाई जी या भैया जी होते थे, बड़ी लड़किया दीदी और साथ के लड़के अपने जैसे- कि वो लड़की हो, कोई भेदभाव नही होता था। और उन्हें बुलाते भी थे तो “ओये सुन” कह कर।

एक बार पता चला कि बनवारी अंकल के घर उनका एक बेटा आया है जो कि बाहर रहता है और पढ़ता है। सब लड़कियां उनके घर चली गयी। आंटी ने सबको बिठाया, शक्करपारे और मठरी कागज में रख कर खाने को दी। खाते खाते पूछा कि आंटी आपके घर कौन आया है। वो बोली मेरा बेटा आया है। फिर तो लड़किया पूछने लगे गयी कहा रहता है क्या करता है। घर से दूर क्यों है।

आंटी को बुरी तरह से चाट दिया। आंटी जब पक गयी तो उन्होंने अपने बेटे को आवाज़ दी- बेटा साहिल जरा इधर आजा, इन लोगों से बातें कर ले। मेरा तो काम ही रुक गया।

जब साहिल भाई आये तो सभी ने नमस्ते की और कुछ देर तक उनको बिना बोले देखती रही और फिर आपस में खुसपुसा के कहा हाय कितना सुंदर है। और फिर सब भाग गई।

अब रोज का नियम हो गया कि जैसे ही साहिल भैया दिखे तो उनको छिप के देखते रहते बिना कुछ कहे। वो देख लेते, पास बुलाते लेकिन सभी लड़किया शरमा जाती और भाग जाती। फिर इकट्ठा होकर आपस में कहती हाय साहिल भैया कितने प्यारे है। काश वो बहोत देर तक हमारे सामने खड़े रहते। एक दिन साहिल भैया ने सबको दोनों हाथों से एक साथ पकड़ लिया और बोले चलो अभी के अभी मेरे घर मुझे बात करनी है तुम लोगो से। एक दूसरे को देख सहेलियों ने आँखों आँखों में सहमति दी और उनके घर चले गए। दोपहर का टाइम था तो उनकी माँ ऊपर वाले कमरे में आराम कर रही थी।

अब बताओ तुम लोग मुझे क्यों घूरते रहते हो। साहिल भैया बोले।

हम कहाँ घूरते है आपको। हमारे हिसाब से उस वक़्त घूरने का मतलब गुस्से से देखना होता था और साहिल भैया सबको इतने प्यारे लगते कि घूरने या गुस्सा होने का मतलब ही नही होता था।

मुझे देखती तो रहती हो छुप छुप के।
जब बुलाता हूँ तो भाग जाती हो।

……. सब चुप कोई कुछ न बोला।

जवाब दो। वो जोर से धमकाते हुए बोले।

भैया आप हमको बहोत अच्छे लगते हो। जल्दी से एक लड़की जिसका नाम हीरनी था वो बोली।

तो?

तो कुछ नही। अब हम जाए। सब एक साथ बोली।

नही । पहले बताओ क्यों अच्छा लगता हूँ। सब फिर चुप हो गयी।

बोलो ना। ए लड़की पहले तुम बताओ। अपनी उंगली से एक की तरफ इशारा किया।

वो घबराई सी कांपती हुई बोली – भैया पता नहीं। पर बहोत अच्छे लगते हो।

और?

और आपको देखते रहने का मन करता है।

ठीक है। इधर खड़े हो जाओ। अब तुम बताओ तुम्हें क्या कहना है। दूसरी लड़की को बोले। उसने भी यही जवाब दिया। उसको भी उस लड़की के साथ खड़ा कर दिया।
फिर औरों के नम्बर भी आया। इस तरह से भैया ने पाँचों लड़कियों से पूछा और सबका एक ही जवाब था।
अब नही मालूम कि भैया को ये सब सुन कर कैसा फील हुआ।

अच्छा मुझसे कौन शादी करेगा।
किसी ने भी जवाब नहीं दिया

हाथ खड़ा करो जो मुझसे शादी करना चाहता है। भैया ने फिर कहा।

पांचों लड़कियों के हाथ उठ गए।
भैया हँसे। सब ने एक दूसरे को देखा लेकिन बोला कोई नही। क्या कहते।

खलो ते सही, हुणे दसनियाँ तवाणु
मेरे पुत्तर नाल शादी करण वालियां नु। इक्क मुंडे ते पंज कुड़ियां मेरी नू बणन आईंया। हुणे दसनियाँ।।

(रुको तो सही , अभी बताती हूँ मेरे बेटे से शादी करने वालो को। एक लड़का और पांच बहुएँ। वो भीमेरे बेटे की अभी बताती हूँ।)

सीढ़ियों से उतरती हुई साहिल भैया की मम्मी पंजाबी में गालियां देती हुई नीचे आयीं। सब लडकिया दरवाजे की तरफ भागी। उसके बाद जब तक साहिब भैया वहां रहे उनके सामने पांच लड़कियों में से कोई नही आया।

ये थी नादान उम्र की लड़कियों की पड़ोस के भैया से लव स्टोरी।

अब सोचते है कि क्या आज भी ऐसी नादान लव स्टोरी होती होगी कि पांच सहेलियां एक साथ किसी एक को पसन्द करे और शादी के लिए भी पांचों तैयार हो जाये।

इति।
राधा गौरांग (राधिका)
15 जुलाई 2020

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