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कुछ ऐसे भी…

Poems

सांझ ढली सूरज डूबा,
पंछी लौटे अपने अपने घौंसले में.

दूर कहीं चर्च के घंटे,
मस्जिदो की अज़ान,
और गूंजते मंदिरों के घंटे,

कुछ घरों में तेज़ रोशनी का सैलाब,
कुछ घरों में टिमटिमाती रोशनी,

कुछ घरों में चहल पहल रात की,
कुछ घरों में वीरानी सी छाई,

कहीं माँ बाप, और कहीं सिर्फ़ माँ,
अकेले बैठे, गिनते उंगलियों में
दिन, महीने और साल.

इन कुछ माँ बाप की संतान / संतानें
चले गये है विदेश कमाने की खातिर
या फिर उज्ज्वल भविष्य की खातिर,
अपने वर्तमान को अंधेरे में छोड़ कर
बेसहारा, बेबस अकेले राह तकने के लिए.

राधिका

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