वक़्त और जख्म

Poems

क्या कहा
वक़्त जख्म भर देता है??

नहीं वक़्त कभी जख्म नहीं भरता,
वो तो चुपचाप खिसकता रहता है.

अपने जख्म को हमें
खुद से ही भरना होता है,
खुद को समझाना और
वक़्त के साथ कदम से कदम
मिला चलना होता है.

पिछला भूल कर, वर्तमान
में रह कर, भविष्य के सपने
संजोना होता है, तब कहीं
जाकर जख्म भरपाता है.

फिर भी दर्द महसूस होता है,
दाग कभी मिटते नहीं.

और आप कहते है –
वक़्त जख्म भर देता है.

…………राधिका

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