Peacock

मोरनी

Poems

मैं थी बागों की मोरनी
बड़ी खुश बड़ी चंचल,
नाचा करती थी काले
काले बादलों के संग
घूमा करती थी ह़रे भरे बागों में
झूमा करती थी मोर के संग,

वक़्त का पहिया ऐसा घूमा,
उजाड़ दिए गये सारे बाग,
सिमट गया जंगल भी,
उग गये चारों और
कंक्रीट के जंगल, फैल गये
मानव निर्मित मशीनो के शोर

कहाँ जाऊ मैं??
ना बचा बाग कहीं
ना बचा जंगल,
मेरी खुशियाँ छीन ली गई
मोर खो गया मेरी संतान
बिछड़ ग़ई, अब मैं कहाँ जाऊ.

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