बन के अजनबी फिर मिले,

Poems

बोझ सी होने लगी
ये जिंदगी, आओ
इसे उतार दें, कहीं
फैंक दे,

चलो इक बार फिर से
अजनबी बन, हम मिले
इक दूजे से उसी पीपल
के पेड़ के नीचे जहाँ
मिले थे कभी पहली बार.

या फिर मिले अमावस की
उन अंधेरी रातों में जुगनू
पकड़ते हुए और टकराए
इक दूजे से,फिर उसी तरह
शरमा कर भाग जाए

या फिर मिलें कभी
दुपहरी में पेड़ के नीचे
छाव की तलाश में
नज़रे चुरा के इक दूजे
को देखे और शरमा जाए

चलो इक बार फिर से
अजनबी बन, हम मिले
और कहीं दूर निकल जाएँ
इक खुशनुमा जिंदगी की
तलाश में,

आओ बन के अजनबी
फिर मिले, फिर मिले.

राधिका

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