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मौसम ने ली करवट, यमुनोत्री और केदारनाथ धाम में हुई बर्फबारी

देहरादून। सोमवार को अचानक मौसम बदला और यमुनोत्री धाम में सीजन की पहली बर्फबारी हुई। बर्फबारी होने से तीर्थ पुरोहितों और यहां पहुंचे यात्रियों के चेहरे खिल गए। बर्फ गिरने से धाम में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। वहीं केदारनाथ में भी दोपहर बाद हल्की बर्फबारी हुई।

सोमवार सुबह चटक धूप खिली लेकिन दोपहर बाद मौसम बदला और साढ़े बारह बजे यमुनोत्री धाम में बर्फबारी शुरू हो गई। अचानक बर्फबारी होने पर तीर्थयात्रियों और तीर्थ पुरोहितों के चेहरे खिल उठे।

यात्रियों ने बर्फबारी का खूब लुत्फ उठाया। तीर्थ पुरोहित अनोज उनियाल, प्रदीप उनियाल आदि ने बताया कि इस सीजन में यह यमुनोत्री में पहला हिमपात है। धाम में करीब आधा घंटे तक बर्फबारी हुई।

हालांकि बर्फ जमी नहीं लेकिन कड़ाके की ठंड होने लगी है। वहीं केदारनाथ में अपराह्न 3 बजे के बाद हल्की बर्फबारी शुरू हो गई, जो लगभग आधा घंटे तक रही। शीत हवा के कारण धाम में ठंड बढ़ गई है।

पुनर्निर्माण कार्य कर रही वुड स्टोन कंस्ट्रक्शन कंपनी के टीम प्रभारी कैप्टन सोबन सिंह बिष्ट ने बताया कि दस दिनों से ठंड का प्रकोप बढ़ गया है। सुबह के समय तापमान कम होने और शीतलहर से ठंड अधिक है। शाम होते ही पाला गिरने से तापमान कम हो रहा है।

धारचूला (पिथौरागढ़) में शीतकाल शुरू होते ही भेड़पालक चीन सीमा से सटे बुग्यालों से घाटियों की ओर लौटने लगे हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों से लौटकर भेड़पालक भेड़ों को लेकर अब तराई भाबर के जंगलों में जाएंगे। धारचूला के व्यास और दारमा घाटियों के 21 गांवों के लोग हर साल माइग्रेशन पर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित अपने मूल गांवों में जाते हैं।

इन गांवों में से अधिकांश ग्रामीणों का व्यवसाय ऊनी कारोबार से जुड़ा होने के कारण भेड़ पालन भी करते है। भेड़पालक हर साल बर्फ पिघलते ही प्रवास पर उच्च हिमालयी क्षेत्रों का रुख करते हैं। इसके बाद अक्तूबर तक प्रवास पर हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों में भेड़ें चराते हैं। इस दौरान भेड़पालक चीन सीमा के निकटवर्ती बुग्यालों तक जाते हैं। व्यास घाटी में ज्योलिंगकांग और दारमा घाटी में पंचाचूली की तलहटी तक पहुंच जाते हैं।

जैसे ही अक्तूबर से बर्फबारी शुरू होती है भेड़पालक भेड़ों के साथ निचले इलाकों को लौटने लगते हैं। शीतकाल में सभी भेड़ पालक तराई भाबर के जंगलों में रहते हैं। भेड़पालक मान सिंह ने बताया कि वह तिदांग के ढाबे बुग्याल से भेड़ों के साथ 10 दिन में धारचूला पहुंचे हैं। अब एक माह में तराई के जंगलों में पहुंच जाएंगे। भेड़पालक हाइवे में ट्रैफिक कम होने पर रात में चलना अधिक पसंद करते हैं।

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