ख्वाहिश छोटी सी

एक ख्वाहिश थी माँ की कि उसकी बेटी के पास एक छोटा सा घर हो, एक छोटा सा आँगन, एक कोने में गुल्मोहर का पेड़ उसकी शाख पर झूला , बादलों से छनती मुठ्ठी भर धूप उस आँगन में हो. Read more

वाह री जिंदगी

खिड़की से झाँकती सुबह की पहली किरण मुझे जगाती है, चिड़ियों की चहचहाट मधुर संगीत सुनाती है शाम होते ही, समंदर की लहरें अपनी और बुलाती है, चूम कर मेरे कदम, खिलखिलाती वापस चली जाती है, अब नहीं आते स्वप्न Read more

जिंदगी

उलझी और बॅल्झी हुई सी जिंदगी, उन आधे अधूरे ख्वाब सी, जो कभी पूरी नहीं हो सकीं उन आधे अधपढ़े किताबों सी, जो तकिये के नीचे या फिर साइड टेबल पर रखी जिन्हें कोई पूरा पढ़ना नहीं चाहता सिर्फ़ बाहर Read more

बन के अजनबी फिर मिले,

बोझ सी होने लगी ये जिंदगी, आओ इसे उतार दें, कहीं फैंक दे, चलो इक बार फिर से अजनबी बन, हम मिले इक दूजे से उसी पीपल के पेड़ के नीचे जहाँ मिले थे कभी पहली बार. या फिर मिले Read more

आज भी

आज भी रातों की तन्हाई में जब कोई पास नहीं होता, तारों संग बातें करते हैं तुम्हें याद करते हैं. राधिका

अकाउंटेंट

  सारी जिंदगी गुणा -भाग करते रहे, दूसरों के आँकड़े इधर से उधर करते रहे. किसी को नुकसान तो किसी को मुनाफ़ा देते रहे. क्या मज़ाल जो एक भी अंक ग़लत हो जाता, बड़ी होशियारी से केल्कुलेटर पे उंगलियाँ नचाते Read more

वक़्त और जख्म

क्या कहा वक़्त जख्म भर देता है?? नहीं वक़्त कभी जख्म नहीं भरता, वो तो चुपचाप खिसकता रहता है. अपने जख्म को हमें खुद से ही भरना होता है, खुद को समझाना और वक़्त के साथ कदम से कदम मिला Read more

आवाज़ ना देना

जा रहे हैं हम मुड़ के नहीं देखेंगे दोबारा देखो आवाज़ ना देना, भूल जाएँगे सारे जख्म पर दाग ना मिटा पाएँगे, होंठो पे होगी हँसी पर दिल की उदासी छुपा ना पाएँगे, होगी फिर वही रात हम सो ना Read more