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ढलती उम्र की शाम

उम्र की दहलीज़ पर, सांझ की आहट हो चुकी है, ख्वाहिशें थम जाती है, और सुकून की तलाश बढ़ जाती है.
उक्त शेर को पढ़ कर मैं खुद एक गहन सोच में पड़ गयी. मेरे भी उम्र की दहलीज़ पर सांझ का आगमन हो गया है और सांझ के साए में ही जी रही हूँ. लेकिन उपर लिखे शेर को पढ़ कर नहीं लगा कि मेरी ख्वाहिशें ख़त्म हो रही हैं, या मैं सुकून की तलाश में हूँ. मेरी दिनचर्या तो आज भी सुबह की अस्त-व्यस्तता से ही शुरू होती है, आज भी ऑफीस जाने की आपाधापी, आज क्या पहनना है, आज क्या खाना है, कब मूवी देखनी है, कब शॉपिंग शुरू करना है, घर की देखभाल, बच्चो की देखभाल और भी बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ जो कभी ख़त्म ही नहीं हुई, और भी बढ़ती चली गयी, इन सब चीज़ों में मस्त रहती हूँ, इनके अलावा कुछ सामाजिक कार्य क्रमों में भी भागीदारी निभाती हूँ, ऐसी कई ख्वाहिशें जो की पहले पूरी नहीं कर पाई थी, तब जब उम्र यौवनावस्था में थी तब आर्थिक संसाधन की कमी रही, सामाजिक प्रतिबंध रहे, ख्वाहिशें दबा दी गयी, अब पूरी कर रही हूँ, जिंदगी जैसे भी हो जीने का ज़ज़्बा आज भी उतने ही उत्साह से है, जितना पहले था, मुझे तो लगता है की उक्त शेर किसी ऐसे शायर ने लिखी थी जो की उम्र की दहलीज़ पर सांझ के आते आते तक चुके थे, और खुद की ख्वाहिशे जो की कभी रही होंगी पूरी नहीं हो पाई और जिंदगी से निराश हो चुके थे तो बेचारे सुकून की तलाश में निकल पड़े होंगे. अरे भाई सुकून तो सिर्फ़ और सिर्फ़ कब्र या शमशान में ही मिल सकता है, और इस सुकून को तलाशने की ज़रूरत नहीं है वो तो इक दिन मिल ही जाएगी तो क्यों ना हम अपनी इस ढलती उम्र की शाम को रोशन ही रहने दे? ज्ञान, दान और दया के दीप जलाए, कुछ मायूस चेहरों पर हँसी लाने का ज़रिया बन जाए. तो आइए एक वादा करलेते है कभी भी अपने को ढलती उम्र के दहलीज़ पर शाम को उदास होने नहीं देंगे, ना ही अंधेरा होने देंगे,
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