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आधुनिक दोस्ती

Dil se Poems Treasure House

बचपन की सखियों के संग खेलना, रूठना, मनाना।

कुछ भी खाने का सामान बन्दर की तरह बांट कर खाना।

खेल के मैदान में एकाएक खेल
रोक कर तितलियों के पीछे भागना।
कभी क्लास रूम में पीछे से
आगे वाली सहेली की चुटिया खींचना
कभी उसकी कुर्सी से दुपट्टा बांध देना।

गर्मियों की दुपहरी में कच्चे आम की फांके नमक मिर्च के संग चटकारे लेले के खाना।

सर्दियों की दुपहरी में नीम्बू, चकोतरा या फिर कच्चे पपीते में लहसुन मिर्च और नमक मिला के खाना।

कभी रात को जुगनू पकड़ कर उसको किताब के पन्ने के ऊपर रख कर पढ़ने की कोशिश करना।

जब भी वक़्त मिलता एक दूसरे के घर बिना किसी सूचना के पहुँच जाते दो तीन दिन रह के आते।

ऐसी बहुत सारी यादें, कुछ याद है कुछ याद नही।

तब और आज की सहेलियों में बड़ा फर्क आ गया है।

एक तो मोबाइल फोन का जमाना , ऊपर से कुछ सहेलियां जॉब वाली हो गयीं। कुछ ज्यादा अमीर हो गयी कुछ गरीबी रेखा के आसपास ।

अब कोई किसी को याद नहीं करता।
ज्यादा ही याद आ गयी तो मोबाइल की घंटी बजा दी, कुछ देर बाते कर ली, मिलने का प्रोग्राम तभी बनाती है जब किसी को अपनी महंगी चीजों की नुमाइश करनी होती है। ये काम तो अक्सर किट्टी पार्टी में भी कर लेती हैं, फिर भी मन नही भरता तो हम जैसी सहेलियाँ याद आजाती।
कितना फर्क आ गया है तब और आज में।

तब कुछ भी खा लेते थे, कच्चा-पक्का, खट्टा -मीठा, ठंडा -गर्म।
आज कोई डाईटिंग पर अटका है तो कोई किसी बीमारी का मरीज है।

क्या आप भी ऐसा महसूस करती है?
कुछ लिख दीजिये, कमेंट कर दीजिये ।

राधिका..

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