Almora, Uttranchal, India
Dil se Short Stories Treasure House

आहा अलमोड़ा

अल्मोड़ा मेरा सपनों का शहर है। बचपन से गुलशन नंदा और रानू के उपन्यास को पढ़ती आयी थी। उनके उपन्यास में अधिकतर अल्मोड़ा, नैनीताल का जिक्र रहता था। 10वीं पढ़ते-पढ़ते गुलशन नन्दा के उपन्यास “कटी पतंग” को पढ़ने का अवसर मिला। अल्मोड़ा और नैनीताल की वादियों में रचा बसा कटी पतंग के ऊपर फिर फ़िल्म भी बनी। उपन्यास पढ़ा, फ़िल्म देखी, बहुत अच्छा लगा। उसके बाद भी कई उपन्यासों में अल्मोड़ा का जिक्र आता रहा। मन में एक सुंदर सी छवि मन में बस गयी थी। लेकिन कभी वहां जाने का ख्याल भी न आया और उम्र के बचपन और जवानी की दहलीज को पार कर लिया तो अचानक अल्मोड़ा जाने का प्रोग्राम बन गया। वहाँ हमको चितई गोलू देवता जी के मंदिर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मार्च के महीने में जल्दबाज़ी में प्रोग्राम बना। जाते वक्त बाई एयर गए लेकिन वापसी में फ्लाइट केंसिल हो गयी और रोडवेज की बस से वापस आगये। कुल मिलाकर 48 घण्टे में जाना आना हुआ न कहीं घूमे न ही कुछ देखा। न ही अल्मोड़ा की वादियों को ठीक से जानने का मौका मिला। खैर खुश थी कि कम से कम अल्मोड़ा की वादियों से तो गुजर रही हूँ। और मन ही मन कहानी बुनती रही कि इस पहाड़ी के पीछे जरूर गुलशन नंदा की कहानी की नायिका रहती होगी। यहां पर क्लब होगा, जिसमें खलनायिका डांस करती होगी। नायिका अपनी कार से इन वादियों में घूमती होगी। नायक इन वादियों में गाना गाते घूमता होगा, इत्यादि इत्यादि। जून के महीने में फिर अचानक।से चितई गोलू देवता जाने का अवसर प्राप्त हुआ । इस वक़्त मेरे साथ मेरी प्रिय दोस्त प्रिया श्रीनिवास मेरे साथ थी अपनी छोटी सी बेटी के संग । मैंने भी अपने छोटे भतीजे क्षितिज को साथ ले लिया अपने घर से टैक्सी बुक करके हम लोग दोबारा नैनीताल के रास्ते होते हुए अल्मोड़ा पहुँचे। इस बार जल्दी बाजी की कोई गुंजाइश नही थी। आराम से पांच दिन का प्रोग्राम बनाया था कि एक दिन अलमोड़ा रुकेंगे वह से मंदिर जायेंगे अगले दिन अलमोड़ा घूमेंगे एक दिन नैनीताल और फिर वापस। अल्मोड़ा में मालरोड के एक अच्छे से होटल में रुके। शाम को मालरोड घूम, खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला की स्वीटशाप से बालमिठाई चॉकलेट मिठाई खरीदी जो कि अलमोड़ा की प्रसिद्ध मिठाई है, फिर कुछ और छोटी छोटी शॉपिंग की, डिनर किया और वापस होटल आ गए। अगले दिन सुबह ही 7 बजे स्वीट शॉप फिर पहुँचे तो देखा कि वहां पर मिठाई लेने वालों की लंबी कतार लगी है। पौने नौ बजे हमारा नम्बर आया, मिठाई लेके हम होटल से चेकआउट हुए और सीधा मंदिर गए। पूरे रास्ते अपने सपनों के शहर को निहारती गयी, बहुत सारी फ़ोटो खींची, रास्ते मे जहां कहीं लगता कि यहां के बारे में लिखा होगा वहां रुक कर चारो तरफ मुआयना करती, खूब सारी फ़ोटो क्लिक करती। फिर ड्राइवर को आगे बढ़ने को कहती। कभी सोचा भी न था कि अलमोड़ा जा पाऊँगी न ही ऐसा कोई खास इरादा था जाने का । पर आखिर अल्मोड़ा का सफर पूरा हो ही गया।
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