शाम बाबू – पार्ट 2

Poems

आज तो शाम बाबू बहुत ही खुश है।
हो भी क्यों ना ? आज उनके घर की पुताई हो रही थी।

बेचारे जब तक जिंदा रहे, हर तरह से जुगाड़ करने की कोशिश करते रहे कि किसी तरह से घर की पुताई हो जाये, लेकिन जैसे ही पैसों का जुगाड़ होता वैसे ही कोई न कोई अड़चन आ जाती मसलन कभी साले की शादी, कभी साली के बच्चों का नामकरण, कभी बुआ के बच्चों की शादी, इसी तरह के बहाने आते गए और घर की पुताई का काम टलता गया। जब उन्होंने ये घर बनाया था तो गाँव में अपनी तरह का पहला मकान बना था जो हर तरह से आधुनिक था, बाथरूम से लेकर किचन, बरामदा, गैलरी बैडरूम में हर तरह की आधुनिक सुख सुविधा, महंगे पेंट से घर की पुताई, बाहरी दीवार पर अपैक्स की पुताई, देखने वाले मुड़ मुड़ के देखते जाते थे घर को। वैसे भी शाम बाबू नाम के बाबू नही थे।कलक्टर साहब के सेकेट्री थे, सो पैसो की आमद बनी रहती थी।

धीरे धीरे समय बीतता गया, घर की पुताई फीकी होती चली गयी।शाम बाबू रिटायर हो गए । सिर्फ पेंशन पे ही गुजर होने लगा। शाम बाबू ने किसी पेंटर को पकड़ के पूछ लिया कि पुताई का एस्टिमेट क्या रहेगा, जब उसने बताया तो वो माथा पकड़ के बैठ गए। इतना महंगा, बाप रे।

जब पैसों का जुगाड़ होता तो घर के अपने झमेले होते। रिश्तेदारों के झमेले होते। बेटों से कहते तो वो कहते बाबू जी इस मकान को बेच कर शहर आजाओ हमारे पास । बेचारे मायूस हो जाते। इसी तरह वक़्त गुजरता रहा और शाम बाबू जुगाड़ की कोशिश में रहते रहते एक दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए।

अगले हफ़्ते उनकी तेरहवीं थी। सो
घर को चोखा करना जरूरी था, इसलिये पुताई शुरू हो गयी। बरामदे समेत सभी कमरों के रंगों को बदल दिया गया। सिर्फ बाबूजी का कमरा ही उसी रंग में था जो उनको पसंद था।

हालांकि शाम बाबू आसमान में बादलों के ऊपर बैठे कह रहे थे अरे भाई बरामदा सफेद रंग में ही रहने दो, लेकिन जब जिंदा रहते उनकी बात नही सुनी गई तो अब क्या सुनते।

खैर उनको तस्सली इसी बात की थी कि उनके जीते जी तो घर की पुताई नही हुई, चलो मरने के बाद ही सही।

राधा गौरांग (राधिका)

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