शामबाबू

Poems

शाम बाबू उदास थे आज. रह रह कर घर की रंग रोगन का ध्यान आ रहा था. किसी रंगने वाले से पूछा था तो कच्चा एस्टिमेट ही पचपन हज़ार रुपयो का बताया, उनका दिल बैठ गया. पिछले सात सालो से घर की पुताई नहीं करा सके थे. पेंट के और मजदूरो के बढ़ते दाम ने उनके कदम रोक लिए थे.

हर साल सोचते इस साल तो कुछ बचा ही लूँगा और दीवाली से पहले घर का रंग रोगन करवा ही लूँगा, लेकिन हर साल कोई ना कोई बहाना ऐसा आता कि बचत का सारा पैसा वहाँ लग जाता. छी: इससे तो अच्छा वही पुराना कच्चा ढाई कमरो का मकान था और एक बड़ा सा आँगन जिसमें अम्मा बाबू जी और भाई बहनों के संग रहता था. बरसात ख़तम होते ही ग्राम के सभी लड़के अपने अपने साइकिल लेकर सुबह ही रायपुर की पहाड़ियो की ओर निकल जाते और दोपहर होते होते अपनी साइकिल के करियर में कॅटटो में भर भर के सफेद मिट्टी ले आते जिससे ग्राम के सभी घरों की पुताई की जाती और नीचे लाल रंग के गेरू से बॉर्डर बना दिया जाता. दीवाली आने तक सभी के घर सफेद और लाल रंग से पुत जाते थे. शहरों में चूने का चलन था जिसमे मनपसंद का रंग मिला के पुताई की जाती थी.

आजकल तो पेंट का फैशन है और वो इतना महँगा पड़ता है कि आज सात साल होने को आए घर की पुताई के बारे में सोचते ही रह गये.

शाम बाबू ने एक गहरी साँस ली और फिर से दीवारें की ओर निहारने लगे. और घर की दीवारें जैसे मायूस होकर उनको ताक रही थी

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