ये पागलपन

Poems

ये पागलपन
अपनी सीमाएं तोड़ना चाहता है,
तोड़कर किनारे मर्यादा की,
चहुँ ओर
फैल जाना चाहता है,
फाड़ कर कपड़े
ओढ़ चिथड़े
गले मे डाले,
सर्पों की माला
जपता रहे प्रिय का नाम.
ये चाहता है,
वो चाहता है,
न जाने और
क्या चाहता है
ये पागलपन मन का,
तोड़कर सब मर्यादा,
नदियों की तरह,
पहाड़ों की गोद से
आज़ाद होकर
समंदर की बाहों में
समा जाना चाहता है.

…राधिका

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