प्रथम प्रेम पत्र

Poems

साप्ताहिक पत्रिका के ताज़ा अंक में पाती प्रेम की का कॉलम पढ़ कर अधेड़ उमर की देवयानी बहुत ज़ोरज़ोर से हँसने लगी.
उसकी सहेली रुपायनी पास ही बैठी बुन रही थी, ने पूछा क्यों हंस रही हो? देवयानी ने पत्रिका का कॉलम उसके सामने रख दिया
उसने देखा और पूछा इसमें हसने की क्या बात है?

अरे हँसने की बात नहीं तो और क्या है? तुमको कभी स्कूल कॉलेज के टाइम पर कभी प्यार हुआ? देवयानी ने पूछा.

उहु कभी नहीं . हमारे जमाने में आजकल की तरह इतनी छूट कहाँ थी? हमेशा नज़रें झुका के चलते थे. किसने हमको देखा, किसने क्या कहा, कभी इस पर ध्यान ही नहीं गया. और स्कूल में तो सभी लड़के भाई होते थे, राखी बाँधते थे सबको लाइन में खड़ा करके.

किसी लड़के ने कुछ कह दिया तो सीधा सर या मैम से शिकायत कर देते थे. इतना कह कर रुपायनी हँसी. फिर पूछा तुझको कभी हुआ प्यार किसी से या किसी ने दिया प्रेम पत्र . देवयानी बहुत ज़ोर से हँसी और फिर कुछ देर तक हँसती ही रही. अरे बता ना? सहेली ने कोहनी से हल्का सा धक्का दिया. देवयानी ने हँसी रोकी फिर बोली प्यार तो किसी से नहीं हुआ लेकिन प्रथम प्रेम पत्र ज़रूर मिला था. क्या??? तुमने कभी बताया नहीं.

ये भी कोई बताने की बात थी. देवयानी बोली. फिर क्या हुआ, किसने दिया था. कौन था, एक साथ सवालो की झड़ी लगा दी रुपायनी ने.
देवयानी ने एक पल को आँखें बंद की जैसे कुछ सोच रही हो या याद करने की कोशिश कर रही हो. फिर
चेहरे पर एक मधुर मुस्कान लाके बोली विनोद को जानती हो जो हमारे साथ १०वी क्लास में पढ़ता था, जो की मेरे चचेरे भाई राजू का दोस्त भी था, मैं उसको भी भाई कहती थी, उसने एक चिट्ठी राजू को दी और राजू ने मुझको. मैने पूछा क्या है तो बोला की विनोद ने तुमको देने को बोला है. उत्सुकता वश मैने वो चिठ्ठी लेली और खोल के पढ़ने लगी. पढ़ते ही मेरा दिमाग़ खराब हो गया.
क्या लिखा था उसमें …. यही की वो मुझको पसंद करता है, मुझसे प्यार करता है, मुझसे शादी करेगा वगेरह वगेरह ..इतना कह कर देवयानी रुकी और एक लंबी साँस ली फिर बोलना शुरू किया मुझे गुस्सा आ गया मैं सीधा चाचाजी के पास गयी और चाचाजी के हाथ में चिठ्ठी दे दी और बोली की राजू को विनोद ने चिठ्ठी दी मुझको देने के लिए और ये पागल उसको डाँट ने के बजाय चिठ्ठी लेके आ गया.

चाचा जी ने गुस्से में भाई की तरफ देखा फिर बिना कुछ बोले पास पड़ी छड़ी उठाई और उसकी पिटाई शुरू कर दी. उसके बाद मैं फिर विनोद के घर गयी और उसके पिताजी को भी वही चिठ्ठी दिखाई और भला बुरा खूब सुनाया और अंत में अपने बेटे को खूब अच्छी तरह से समझा देना कह कर घर लौट आई.

अगले दिन पता चला की विनोद की भी खूब पिटाई हुई, और फिर हम तीनो की काफ़ी सालों तक कोई बोल चाल नहीं हुई.
अब जब विनोद की बेटी की शादी थी तब वो निमंत्रण पत्र देने घर आया था, तभी उससे बात हुई. इतना कह कर दोनो सहेलियाँ हसने लगी.

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