छोटी सी नाव

Poems

विशाल सागर के सीने पर
चंचल लहरों से
अठखेलियाँ करती,
उलझती, डूबती,
उतराती, इतराती
छोटी सी नाव,

किस दिशा की ओर
बहती चली जा रही है
बिन पतवार बिन मांझी
ये छोटी सी नाव?

कई बार चाहा
ढूँढ ले कोई मांझी,
ले सहारा किसी पतवार का
मोड़ दे दिशा अपनी,
बदल दे रूख़ हवा का,

पर ना जाने क्यूँ
चाह कर भी,
ढूँढ ना पाती मांझी कोई,
ना लेती सहारा
किसी पतवार का
ना बदलती रूख़ हवा का
ना ही दिशा नाव की,

समझ ना पाई अब तक
क्या चाहत है उसकी,
कैसा मांझी चाहिए उसे
कैसा सहारा हो पतवार का,

यही सोच सोच कर
उलझती जाती और
फिर फँस जाती
बीच भंवर में नाव,

अंत में थकी हारी,
लहरों के विश्वास पर
क्षितिज के आश्वासन पर
लगती डूबने, उतरने,
संभलने और फिर उलझने
ये छोटी सी नाव

राधिका (राधा गौरांग)

Leave a Reply