Poems

अमावस का चाँद

अहा क्या बात है,  आज मेरी जान बड़ी खूबसूरत लग रही हो जैसे पूनम का चांद। अच्छा जी, कल तो कह रहे थे कि चौदहवीं का चांद लग रही हूँ। अरे वो कल की बात थी, कल भी बड़ी खूबसूरत लग रही थी जैसे चौदहवीं का चांद,  तो कह दिया । आज उससे भी ज्यादा  खूबसूरत लग रही हो, पति महोदय कुछ ज्यादा ही  रोमांटिक मूड में दिख रहे थे, दिखते भी क्यों  ना, एक दो पेग बाहर से  दोस्तों के संग लगा के आ गये थे घर। वो क्या है ना कि जब आदमी बाहर से पी कर आता है तो अब बीवी के सामने कैसे जाए, जाए भी तो क्या कहे, सो यहां पति महोदय ने चतुराई करने की ठानी और लगे बीवी की चापलूसी करने । अच्छा तो कल चौदहवीं का चांद लगी और आज पूनम का चांद लग रही हूँ। अमावस के दिन क्या कहोगे। अमावस का चांद,  पति महोदय अपनी रौ में  बोले। उफ्फ्फ…..  इतना कह कर पति महोदय ने अपना सिर पकड़ लिया। पत्नी के हाथ में बेलन  था वहीं से खींच के मारा तो पति के सिर में जाके लगा। एक  तो बाहर से पीकर आये हो, उप्पर से बकवास किये जा रहे हो। अमावस का चांद देखा है कभी। लो अभी  देख लो। पत्नी ने तिरछी नज़र से पति को देखा और बड़बड़ाती हुई  बेलन को उठाने को झुकी। हाय मर गयी। पत्नी के मुँह से एक चीख निकली। पत्नी सीधा घुटनो के बल जमीन पर,  पति महोदय ने भी बदला ले लिया था,  झुकी हुई बीवी को एक लात मार कर किचन से भाग गए और छुप गए बेडरूम में जाकर । इस तरह आज पति पत्नी दोनों को ही पूनम की रात में ही अमावस का चांद दिख गया। राधा गौरांग (राधिका)
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