अकाउंटेंट

Poems

 

सारी जिंदगी
गुणा -भाग
करते रहे,
दूसरों के आँकड़े
इधर से उधर
करते रहे.

किसी को नुकसान
तो किसी को मुनाफ़ा
देते रहे.

क्या मज़ाल जो
एक भी अंक ग़लत
हो जाता,
बड़ी होशियारी से
केल्कुलेटर पे
उंगलियाँ नचाते रहे.

इतने साल लाखों
करोड़ो का
हिसाब करते रहे

जब आई अपनी
बारी हिसाब की
देखा एक भी अंक
सही ना था,

कुछ भी सही नहीं
सब ग़लत और
सिवा सिफ़र के
वहाँ कुछ ना था.

Leave a Reply